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डर से जीत तक: कैंसर को मात देती एक सच्ची कहानी

37 साल के नवीन मेहता की मुँह के कैंसर (बकल म्यूकोसा) से लड़ाई और केडी कैंसर सेंटर, अहमदाबाद के डॉ. निकेत शाह द्वारा कीमोथेरेपी, इम्यूनोथेरेपी व सफल सर्जरी से कैंसर को मात देने की एक सच्ची प्रेरणादायक कहानी।
Priya Rathore
Priya RathoreCultural & Heritage Correspondent
September 16, 2026 • 11:51 AM31 Reads
डर से जीत तक: कैंसर को मात देती एक सच्ची कहानी

"पापा, कैंसर उम्र देखकर नहीं आता, यह आज साबित हो गया..." आँखों में आँसू और हाथ में बायोप्सी की रिपोर्ट थामे नवीन मेहता (नाम बदला हुआ है) बोले। सामने बैठे पिता के पैरों तले मानो ज़मीन खिसक गई। कैंसर के नाम के साथ ही 'अब आगे क्या?' का विचार दिल के कोने-कोने में फैल गया। सिर्फ 37 साल की उम्र में कैंसर? कैसे? बेटी तो अभी सिर्फ 3 साल की है, उसका क्या होगा?

विचारों का एक बवंडर सा चल रहा था। नवीनभाई जानते थे कि अगर वे हिम्मत हार गए, तो पूरा परिवार बिखर जाएगा। पास बैठे छोटे भाई ने कहा, "चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा।" लेकिन उस वक्त नवीनभाई के दिल में मचे तूफान के आगे ये शब्द बेहद फीके लग रहे थे। पिता ने गले में अटके दर्द को दबाते हुए कहा, "बेटा, हमें ऑन्कोलॉजिस्ट को दिखाना ही पड़ेगा।" अगले दिन वे केडी कैंसर सेंटर में डॉ. निकेत शाह से मिले।

"डॉक्टर साहब, मैं बच तो जाऊँगा ना?" नवीनभाई के मुँह से बेबसी में यह सवाल निकल ही गया। डॉ. निकेत ने उन्हें बैठाते हुए कहा, "अभी कुछ भी कहना मुश्किल है, लेकिन हम हर संभव कोशिश करेंगे। भरोसा रखेंगे तो इस जंग का नतीजा ज़रूर अच्छा आएगा।" डॉक्टर निकेत की बातें सुनकर नवीनभाई के मन में एक उम्मीद जागी। "साहब, आप जो कहेंगे मैं वो करने को तैयार हूँ, बस मुझे ठीक कर दीजिए।"

पेट-सीटी (PET-CT) और कुछ अन्य ब्लड टेस्ट कराए गए, जिनसे पता चला कि यह 'लोकली एडवांस्ड बकल म्यूकोसा' यानी मुँह का कैंसर है, और इसके साथ थोड़ी लिम्फ नोड भी जुड़ी हुई हैं। अगर सीधे सर्जरी की जाती, तो मुँह और गले का एक बड़ा हिस्सा निकालना पड़ता। नवीनभाई की कम उम्र को देखते हुए डॉ. निकेत ने हर पहलू को समझाया कि सर्जरी के बाद कीमोथेरेपी और रेडिएशन का रास्ता। साथ ही, उन्होंने एक और विकल्प भी सुझाया।

तय यह हुआ कि अगर संभव हो, तो पहले 6 कीमोथेरेपी और साथ में इम्यूनोथेरेपी दी जाए। इसके नतीजों और ट्यूमर की स्थिति को देखने के बाद ही आगे सर्जरी का फैसला लिया जाएगा।

एक नई उम्मीद के साथ नवीनभाई ने कीमोथेरेपी और इम्यूनोथेरेपी शुरू की। लगभग 6 महीने के अंत में थेरेपी के बहुत अच्छे नतीजे मिले और ट्यूमर काफी छोटा हो गया। एक बार फिर पेट-सीटी स्कैन की सलाह दी गई। नतीजे नवीनभाई के पक्ष में थे, बस यह देखना था कि ट्यूमर अब कितना बचा है। बायोप्सी में जो ट्यूमर पहले 22 mm का था, वह घटकर लगभग नाममात्र रह गया था।

इसके बाद डॉ. निकेत ने सर्जरी के ज़रिए बचे हुए ट्यूमर को निकालने और रिकंस्ट्रक्शन सर्जरी करने की सलाह दी। सर्जरी सफलतापूर्वक की गई। आज सर्जरी को 6 महीने हो चुके हैं। नवीनभाई अब पहले की तरह खा-पी सकते हैं और अपनी सामान्य ज़िंदगी में लौट चुके हैं।

यह मामला डॉक्टर की सूझबूझ और मरीज के अटूट विश्वास की एक जीती-जागती मिसाल है।

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